उत्तराखंड में निधि खर्च करने में ढीले पहाड़ी विधायक, भाजपा से ज्यादा खर्च कर रहे हैं कांग्रेसी MLA, आरटीआई में खुलासा - सच की आवाज

उत्तराखंड में निधि खर्च करने में ढीले पहाड़ी विधायक, भाजपा से ज्यादा खर्च कर रहे हैं कांग्रेसी MLA, आरटीआई में खुलासा

नदीम की आरटीआई में ग्राम्य विकास आयुक्त ने दी जानकारी, 1,664 करोड़ की विधायक निधि में से ₹1,091 करोड़ खर्च, रिपोर्ट- धीरज सजवाण

देहरादून: उत्तराखंड के ज्यादातर विभाग रेवेन्यू कलेक्शन में बहुत पीछे छूटे हुए हैं. अब उत्तराखंड के विधायकों की निधि खर्च करने में भी बड़ी बात सामने आई है. जून 2026 तक प्रदेश के विधायकों को मिली 1,664 करोड़ की विधायक निधि में से सिर्फ 1,091 करोड़ रुपये ही खर्च हुए हैं.

आंकड़ों में पहाड़ी विधायकों का औसत खर्च करीब 14.74 करोड़, मैदानी विधायकों का 16.88 करोड़ और मिश्रित जिलों का 15.77 करोड़ रुपये है. वहीं विधायकवार दर्ज खर्च प्रतिशत के औसत में कांग्रेस विधायक 68.4% और भाजपा विधायक 64.4% पर हैं. आरटीआई एक्टिविस्ट नदी ने ग्राम्य विकास आयुक्त कार्यालय से ये जानकारी जुटाई.

उत्तराखंड के विधायकों की निधि खर्च का लेखा जोखा: उत्तराखंड में विधानसभा चुनाव से पहले विधायक निधि के इस्तेमाल का सरकारी डाटा सियासी तस्वीर का एक अलग पहलू सामने ला रहा है. ग्राम्य विकास आयुक्त कार्यालय से आरटीआई के जरिए उपलब्ध कराई गई वित्तीय वर्ष 2022-23 से 2025-26 और जून 2026 तक की जानकारी को विधानसभा, जिला और राजनीतिक दल के हिसाब से देखने पर पता चलता है कि विधायक निधि खर्च की रफ्तार पूरे प्रदेश में एक जैसी नहीं है. कहीं विधायक 70 प्रतिशत से ज्यादा निधि खर्च कर चुके हैं, तो कई विधानसभा क्षेत्रों में खर्च 60 प्रतिशत से नीचे है.

विधायक निधि खर्च करने में ढीले पहाड़ी विधायक: सबसे दिलचस्प अंतर पहाड़ और मैदान के बीच दिखाई देता है. हरिद्वार और उधम सिंह नगर जैसे मैदानी जिलों के विधायकों ने औसतन करीब 16.88 करोड़ रुपये की विधायक निधि खर्च की है. पहाड़ी जिलों के विधायकों का औसत खर्च करीब 14.74 करोड़ रुपये रहा. देहरादून और नैनीताल जैसे मिश्रित जिलों को अलग रखने पर इनका औसत करीब 15.77 करोड़ रुपये बैठता है.

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1,664 करोड़ रुपये थी विधायक निधि: प्रदेश की पूरी तस्वीर से शुरुआत करें तो वर्ष 2022-23 से जून 2026 तक विधायकों के लिए 1,664 करोड़ रुपये की विधायक निधि उपलब्ध रही. इसमें से करीब 1,091.29 करोड़ रुपये खर्च दर्ज है. यानी कुल उपलब्ध निधि का करीब 66 प्रतिशत हिस्सा खर्च हुआ और लगभग 572.71 करोड़ रुपये की राशि उस समय तक खर्च नहीं हुई थी. विभागीय दस्तावेज में हर विधानसभा क्षेत्र के लिए उपलब्ध निधि, खर्च और खर्च प्रतिशत अलग-अलग दर्ज किया गया है. यही आंकड़े विधानसभा क्षेत्रों की तुलना के लिए आधार बनते हैं.

पहाड़ में औसत खर्च करीब 14.74 करोड़: अगर विधायक निधि को भौगोलिक आधार पर देखें, तो तस्वीर और ज्यादा दिलचस्प हो जाती है. पहाड़ी जिलों में उत्तरकाशी, चमोली, रुद्रप्रयाग, टिहरी, पौड़ी, अल्मोड़ा, बागेश्वर, चंपावत और पिथौरागढ़ की विधानसभा सीटों को रखा गया है. इन 34 विधानसभा क्षेत्रों के लिए उपलब्ध विधायक निधि करीब 807.5 करोड़ रुपये बैठती है और जून 2026 तक खर्च राशि करीब 501.07 करोड़ रुपये रही. यानी प्रति विधायक औसत खर्च करीब 14.74 करोड़ रुपये और कुल खर्च दर करीब 62 प्रतिशत रही.

मैदान में औसत खर्च 16.88 करोड़: इसके मुकाबले मैदानी जिलों हरिद्वार और उधम सिंह नगर की 20 विधानसभा सीटों के लिए कुल उपलब्ध निधि करीब 475 करोड़ रुपये रही. इसमें से लगभग 337.86 करोड़ रुपये खर्च हुए. यानी मैदानी विधायकों का औसत खर्च करीब 16.88 करोड़ रुपये प्रति विधायक और खर्च दर करीब 71.1 प्रतिशत रही. इस तरह पहाड़ी और मैदानी विधायकों के औसत खर्च में करीब 2.14 करोड़ रुपये प्रति विधायक का अंतर दिखाई देता है.

मैदान 9 फीसदी अंग आगे: प्रतिशत के लिहाज से भी मैदान करीब 9 प्रतिशत अंक आगे है. यानी विधायक निधि खर्च के डेटा में मैदान में खर्च की रफ्तार पहाड़ से तेज दिखाई देती है. हालांकि यह आंकड़ा सिर्फ निधि खर्च की स्थिति बताता है. इससे खर्च कम या ज्यादा होने के कारण का स्वत: निष्कर्ष नहीं निकाला जा सकता. पहाड़ी क्षेत्रों में प्रशासनिक प्रक्रिया, भौगोलिक परिस्थितियां, कार्यस्थल की पहुंच और परियोजनाओं की प्रकृति जैसे कई कारक अलग हो सकते हैं, लेकिन उपलब्ध आरटीआई दस्तावेज इन कारणों का विश्लेषण नहीं करता.

देहरादून-नैनीताल की तस्वीर अलग, न पहाड़ न पूरा मैदान: देहरादून और नैनीताल को अलग रखने की वजह भी आंकड़ों में साफ दिखाई देती है. दोनों जिलों में पहाड़ी और मैदानी/भाबर क्षेत्र वाली विधानसभा सीटें हैं. इसलिए इन्हें सीधे पहाड़ या मैदान में डालना तुलना को कमजोर कर सकता था. इन दोनों जिलों की 16 विधानसभा सीटों में उपलब्ध विधायक निधि करीब 380 करोड़ रुपये है और खर्च लगभग 252.36 करोड़ रुपये दर्ज है. यानी यहां प्रति विधायक औसत खर्च करीब 15.77 करोड़ रुपये और कुल खर्च दर करीब 66.4 प्रतिशत रही. इस तरह तीन हिस्सों में देखें तो तस्वीर साफ बनती है. पहाड़ी जिले करीब 62 प्रतिशत, मिश्रित जिले करीब 66.4 प्रतिशत और मैदानी जिले करीब 71.1 प्रतिशत खर्च दर पर हैं. यानी विधायक निधि के इस्तेमाल की रफ्तार का डेटा उत्तराखंड के भौगोलिक विभाजन के साथ एक पैटर्न जरूर दिखाता है.

कांग्रेस विधायक निधि खर्च में भाजपा विधायकों से आगे: विधायक निधि के खर्च को मौजूदा राजनीतिक दलों के आधार पर देखें तो एक और दिलचस्प तस्वीर सामने आती है. उत्तराखंड सरकार की मौजूदा विधायक सूची के अनुसार विधानसभा में 47 भाजपा, 20 कांग्रेस, एक बसपा और दो निर्दलीय विधायक दर्ज हैं. इन मौजूदा पार्टी संबद्धताओं को आंकड़ों में दर्ज विधायक निधि खर्च प्रतिशत के साथ मिलाने पर भाजपा विधायकों के खर्च प्रतिशत का औसत करीब 64.4 प्रतिशत बैठता है. कांग्रेस विधायकों का औसत करीब 68.4 प्रतिशत है.

कांग्रेस विधायक बीजेपी विधायकों से 4 फीसदी आगे: यानी विधायकवार दर्ज प्रतिशत के साधारण औसत में कांग्रेस विधायक भाजपा विधायकों से करीब 4 प्रतिशत अंक आगे दिखाई देते हैं. यहां एक महत्वपूर्ण बात यह है कि यह विधायकवार प्रतिशतों का औसत है. इसे पूरे भाजपा और कांग्रेस की कुल निधि की भारित व्यय दर (weighted expenditure rate) नहीं समझना चाहिए. दोनों दलों के विधायकों की संख्या भी अलग है. इसके बावजूद राजनीतिक डाटा के रूप में यह तुलना दिलचस्प है, क्योंकि यह बताती है कि उपलब्ध निधि के इस्तेमाल के प्रतिशत में दोनों प्रमुख दलों के विधायकों के बीच क्या अंतर दिखाई देता है.

कांग्रेस से फुरकान अहमद 77 फीसदी खर्च के साथ सबसे आगे: कांग्रेस खेमे में कई विधायक खर्च प्रतिशत के ऊपरी स्तर पर हैं. पिरान कलियर के फुरकान अहमद 77 प्रतिशत खर्च के साथ सबसे ऊंचे स्तर पर हैं. ज्वालापुर के रवि बहादुर 76 प्रतिशत और मंगलौर के वर्तमान कांग्रेस विधायक काजी निजामुद्दीन 76 प्रतिशत के स्तर पर दर्ज हैं. हरिद्वार ग्रामीण की विधायक अनुपमा रावत 73 प्रतिशत, भगवानपुर की ममता राकेश 71 प्रतिशत, झबरेड़ा के वीरेंद्र कुमार 72 प्रतिशत और चकराता के प्रीतम सिंह 51 प्रतिशत के स्तर पर हैं. वर्तमान पार्टी संबद्धताओं की पुष्टि उत्तराखंड सरकार की विधायक सूची से होती है.

बीजेपी विधायकों में 77 फीसदी के साथ प्रदीप बत्रा आगे: भाजपा विधायकों में रुड़की के प्रदीप बत्रा 77 प्रतिशत खर्च के साथ सबसे ऊंचे स्तर पर हैं. उनके अलावा बागेश्वर के चंदन राम दास (अब स्वर्गीय) और सल्ट के महेश जीना 75 प्रतिशत के स्तर पर हैं. राजकुमार पोरी 73 प्रतिशत, सतपाल महाराज 68 प्रतिशत, गणेश जोशी 65 प्रतिशत, खजान दास 66 प्रतिशत और मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी की चंपावत विधानसभा सीट में खर्च 53 प्रतिशत दर्ज है. ये प्रतिशत PDF की विधानसभा-वार तालिका में दर्ज खर्च के आधार पर हैं.

हरिद्वार से सबसे ज्यादा विधायक निधि खर्चने वाले विधायक: पूरे डाटा में सबसे ऊंचा दर्ज खर्च प्रतिशत 77 प्रतिशत है और इस स्तर पर दो विधायक हैं. रुड़की के प्रदीप बत्रा और पिरान कलियर के फुरकान अहमद. इसके बाद 76 प्रतिशत के स्तर पर कांग्रेस के रवि बहादुर और काजी निजामुद्दीन दर्ज हैं. 75 प्रतिशत के स्तर पर भाजपा की बागेश्वर सीट पर पहले चंदन राम दास और पार्वती दास के अलावा महेश जीना तथा कांग्रेस के मदन सिंह बिष्ट आते हैं. 74 प्रतिशत के स्तर पर खानपुर के निर्दलीय उमेश कुमार, हल्द्वानी के कांग्रेस विधायक सुमित हृदयेश और नानकमत्ता के कांग्रेस विधायक गोपाल सिंह राणा दर्ज हैं.

73 फीसदी खर्च वाले विधायक: इसके बाद 73 प्रतिशत वाले समूह में कई भाजपा और कांग्रेस विधायक शामिल हैं. यानी सबसे ऊंचे खर्च प्रतिशत की सूची में भी दोनों प्रमुख दलों के विधायक मौजूद हैं. यही वजह है कि केवल पार्टी के आधार पर विधायक निधि खर्च की एकतरफा तस्वीर बनाना उचित नहीं होगा. आंकड़े बताते हैं कि दोनों दलों के विधायकों के बीच ऊंचे खर्च वाले विधानसभा क्षेत्र मौजूद हैं, लेकिन समूह औसत में कांग्रेस का आंकड़ा भाजपा से ऊपर आता है.

60 फीसदी विधायक निधि खर्च से नीचे ज्यादातर विधायक और मंत्री भी: विधायक निधि खर्च के आंकड़ों एक और पहलू भी कम दिलचस्प नहीं है. टिहरी विधायक किशोर उपाध्याय की विधानसभा सीट में करीब 30 प्रतिशत विधायक निधि खर्च दर्ज है, जो विधायक निधि खर्च के आंकड़ों में सबसे कम प्रतिशत है. इसके बाद यमकेश्वर में 44 प्रतिशत और चकराता में 51 प्रतिशत जैसे आंकड़े सामने आते हैं. कपकोट में 52 प्रतिशत, चंपावत में मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी की सीट पर 53 प्रतिशत और कुछ अन्य विधानसभा क्षेत्रों में खर्च 60 प्रतिशत से नीचे दर्ज है.

उत्तराखंड के कैबिनेट मंत्रियों में प्रदीप बत्रा 77% निधि खर्च करके टॉप पर हैं. सौरभ बहुगुणा 72% निधि खर्च करके मंत्रियों में दूसरे नंबर पर हैं. मदन कौशिक 70% विधायक निधि खर्च करके तीसरे नंबर पर हैं. सतपाल महाराज ने 68%, खजान दास ने 66%, गणेश जोशी ने 65%, राम सिंह कैड़ा 62% और रेखा आर्या ने 60% विधायक निधि खर्च की है. तीन कैबिनेट मंत्री सुबोध उनियाल 57%, भरत सिंह चौधरी 57% और डॉ. धन सिंह रावत 37% विधायक निधि खर्च कर 60 फीसदी के आंकड़े से नीचे हैं.

चुनावी साल में विधायक निधि का आंकड़ा क्यों अहम: मौजूदा विधानसभा का कार्यकाल अब अंतिम दौर में है. ऐसे में विधायक निधि का यह डाटा राजनीतिक रूप से इसलिए भी महत्वपूर्ण है, क्योंकि यह सभी विधानसभा क्षेत्रों के लिए एक समान वित्तीय अवधि की तस्वीर देता है. अभी तक उपलब्ध कुल 1,664 करोड़ रुपये में से करीब 1,091 करोड़ रुपये खर्च हो चुके हैं, करीब 573 करोड़ रुपये खर्च होना बाकी है. आने वाले महीनों में विधायक निधि खर्च की रफ्तार बढ़ती है या नहीं, यह अलग से देखने वाली बात होगी.

इस पूरे डाटा की सबसे बड़ी कहानी किसी एक विधायक की रैंकिंग नहीं, बल्कि उत्तराखंड के विधायक निधि खर्च का भूगोल और राजनीतिक पैटर्न है. पहाड़ी जिलों में औसत खर्च करीब 14.74 करोड़ रुपये प्रति विधायक है, जबकि हरिद्वार और उधम सिंह नगर के मैदानी विधानसभा क्षेत्रं के विधायकों का औसत करीब 16.88 करोड़ रुपये है. देहरादून और नैनीताल के मिश्रित जिलों में यह करीब 15.77 करोड़ रुपये है.

वहीं राजनीतिक दलों के विधायकवार खर्च प्रतिशत का औसत कांग्रेस के लिए करीब 68.4 और भाजपा के लिए करीब 64.4 प्रतिशत है. यानी विधायक निधि का पैसा कहां कितना खर्च हुआ, इसकी कहानी सिर्फ सत्ता पक्ष बनाम विपक्ष की नहीं है. इसमें भूगोल भी अपना असर दिखाता है और विधानसभा क्षेत्रवार अंतर भी. एक तरफ 77 प्रतिशत तक खर्च करने वाले विधायक हैं, तो दूसरी तरफ 30 प्रतिशत के स्तर पर मौजूद विधानसभा क्षेत्र भी हैं. जून 2026 तक का सरकारी डाटा उत्तराखंड की 70 विधानसभा सीटों में विधायक निधि के इस्तेमाल की ऐसी तस्वीर सामने रखता है, जिसमें मैदान की खर्च रफ्तार पहाड़ से तेज, मिश्रित जिलों की स्थिति बीच में और राजनीतिक दलों के औसत में कांग्रेस का आंकड़ा भाजपा से ऊपर दिखाई देता है.

विधायक निधि की केवल डिमांड ही नही उपयोग भी जरूरी: वरिष्ठ पत्रकार नीरज कोहली ने उत्तराखंड में विधायक निधि के उपयोग और पर्वतीय क्षेत्रों के विकास की वास्तविक स्थिति पर चिंता व्यक्त करते हुए कहा कि-

वर्ष 2002 में जब राज्य की पहली निर्वाचित सरकार बनी थी, तब विधायक निधि केवल ₹75 लाख हुआ करती थी. आज ये बढ़कर ₹5 करोड़ सालाना यानी एक विधायक के पूरे 5 वर्ष के कार्यकाल में कुल ₹25 करोड़ हो चुकी है. सत्ता पक्ष और विपक्ष, दोनों ही क्षेत्रों के प्रतिनिधि अपने-अपने इलाकों को विकास से वंचित न रहने देने और बड़े क्षेत्रों की जरूरतों का हवाला देकर निधि बढ़ाने के लिए सरकार पर लगातार दबाव बनाते हैं. परंतु दूसरी ओर इस धनराशि को प्रभावी ढंग से खर्च करने की उनकी क्षमता में भारी कमी दिखाई देती है, जो कि उत्तराखंड जैसे सीमित संसाधनों वाले राज्य के लिए बिल्कुल भी उचित नहीं है.
-नीरज कोहली, वरिष्ठ पत्रकार-

राज्य के वार्षिक बजट पर चर्चा करते हुए उन्होंने स्पष्ट किया कि सरकार का अधिकांश पैसा प्रशासनिक व सरकारी कार्यों में ही खर्च हो जाता है और वास्तविक विकास कार्यों के लिए बहुत कम बजट बच पाता है. इस कारण राज्य को बार-बार केंद्र की मदद पर आश्रित रहना पड़ता है. ऐसी स्थिति में, यदि विधायक दबाव बनाकर निधि बढ़वाते हैं और फिर भी उसे पूरा खर्च नहीं कर पाते, तो यह एक दोहरी विडंबना है.

पर्वतीय क्षेत्र के विधायकों की जिम्मेदारी ज्यादा: नीरज कोहली ने कहा कि विधायक निधि का शत-प्रतिशत और सही उपयोग करना सत्ता व विपक्ष दोनों के विधायकों का नैतिक कर्तव्य और धर्म है. विशेष रूप से पर्वतीय क्षेत्रों का जिक्र करते हुए उन्होंने कहा कि राज्य निर्माण की मूल अवधारणा ही पहाड़ों का विकास थी, परंतु आज बुनियादी सुविधाओं के अभाव के कारण पहाड़ों से लगातार पलायन हो रहा है और पर्वतीय क्षेत्र अब भी विकास की दृष्टि से अछूते हैं. इसीलिए पर्वतीय क्षेत्र के विधायकों की यह सबसे बड़ी जिम्मेदारी बनती है कि वे अपनी विधायक निधि का अधिकतम और सही सदुपयोग करके पहाड़ों को सिंचित व विकसित करें ताकि राज्य के निर्माण का वास्तविक उद्देश्य पूरा हो सके.