3 साल में सिर्फ ₹3.09 लाख के विज्ञापन, औसतन ₹8,600 महीना, आखिर पत्रकार और न्यूज़ पोर्टल अपना खर्च कैसे चलाएं? - सच की आवाज

3 साल में सिर्फ ₹3.09 लाख के विज्ञापन, औसतन ₹8,600 महीना, आखिर पत्रकार और न्यूज़ पोर्टल अपना खर्च कैसे चलाएं?

देहरादून। उत्तराखंड के सूचना एवं लोक संपर्क विभाग द्वारा जारी विज्ञापनों के आंकड़े एक गंभीर सवाल खड़ा करते हैं। यदि उपलब्ध विवरण पर नजर डालें तो लगभग 36 महीनों की अवधि में कुल 16 विज्ञापन जारी किए गए, जिनकी कुल राशि ₹3,09,500 रही। इसका सीधा अर्थ है कि एक वर्ष में औसतन लगभग ₹1.03 लाख और प्रति माह केवल ₹8,600 का विज्ञापन प्राप्त हुआ।

सवाल यह है कि क्या इतनी राशि से कोई समाचार संस्थान अपने कार्यालय का किराया, रिपोर्टिंग का खर्च, इंटरनेट, बिजली, कैमरा, वेबसाइट, सर्वर, कर्मचारियों का मानदेय और अपने परिवार का पालन-पोषण कर सकता है?



वर्षवार स्थिति


वर्ष 2023

  • कुल विज्ञापन: 4
  • कुल राशि: ₹75,000
  • औसत मासिक राशि: लगभग ₹6,250
  • पूरे वर्ष के 12 महीनों में से केवल 4 महीनों में विज्ञापन प्राप्त हुए।

वर्ष 2024

  • कुल विज्ञापन: 5
  • कुल राशि: ₹99,500
  • औसत मासिक राशि: लगभग ₹8,292
  • वर्षभर में केवल 5 महीनों में विज्ञापन जारी हुए।

वर्ष 2025

  • कुल विज्ञापन: 5
  • कुल राशि: ₹95,000
  • औसत मासिक राशि: लगभग ₹7,917
  • पूरे वर्ष में केवल 5 महीनों तक ही विज्ञापन मिले।

वर्ष 2026 (अब तक)

  • कुल विज्ञापन: 2
  • कुल राशि: ₹40,000

सबसे बड़ा सवाल

आज डिजिटल पत्रकारिता के दौर में एक समाचार पोर्टल या छोटे मीडिया संस्थान को चलाने के लिए वेबसाइट का रखरखाव, डोमेन-होस्टिंग, तकनीकी खर्च, रिपोर्टिंग, फोटो-वीडियो कवरेज, यात्रा, इंटरनेट, बिजली और कर्मचारियों पर हर महीने अच्छा-खासा खर्च आता है। ऐसे में यदि औसतन सरकारी विज्ञापन की राशि ₹8,600 प्रति माह के आसपास हो और वह भी हर महीने नहीं बल्कि साल में केवल 4 या 5 बार मिले, तो छोटे और मध्यम समाचार संस्थानों के लिए आर्थिक रूप से टिके रहना बेहद कठिन हो जाता है।

पत्रकारों का कहना:

पत्रकारों का कहना है कि वे सरकार की योजनाओं और जनहित की सूचनाओं को गांव-गांव और आम जनता तक पहुंचाने का महत्वपूर्ण कार्य करते हैं। इसके बावजूद यदि विज्ञापन इतने सीमित और अनियमित मिलें, तो स्वतंत्र और निष्पक्ष पत्रकारिता पर भी आर्थिक दबाव बढ़ना स्वाभाविक है।

उनका कहना है कि यह मुद्दा केवल विज्ञापन राशि का नहीं, बल्कि प्रदेश में छोटे समाचार पत्रों, डिजिटल पोर्टलों और स्थानीय पत्रकारिता के अस्तित्व से भी जुड़ा हुआ है।

उठ रहे हैं ये सवाल

  • क्या लगभग ₹8,600 प्रति माह में कोई समाचार संस्थान संचालित किया जा सकता है?
  • जब विज्ञापन पूरे वर्ष में केवल 4–5 बार ही मिलें, तो बाकी महीनों का खर्च कैसे चले?
  • क्या छोटे और क्षेत्रीय मीडिया संस्थानों के लिए विज्ञापन वितरण नीति पर पुनर्विचार की आवश्यकता है?
  • क्या सरकार और सूचना विभाग को स्थानीय पत्रकारिता को मजबूत करने के लिए अधिक पारदर्शी और संतुलित व्यवस्था नहीं बनानी चाहिए?

इन आंकड़ों ने एक बार फिर यह बहस छेड़ दी है कि लोकतंत्र के चौथे स्तंभ को मजबूत रखने की जिम्मेदारी निभाने वाले छोटे समाचार संस्थानों को आर्थिक रूप से सक्षम बनाने के लिए क्या वर्तमान व्यवस्था पर्याप्त है, या फिर इसमें व्यापक सुधार की आवश्यकता है।