चीफ जस्टिस सूर्यकांत यहां राष्ट्रीय राजधानी में राम जेठमलानी मेमोरियल लेक्चर सीरीज में बोल रहे थे.
नई दिल्ली: भारत के चीफ जस्टिस सूर्यकांत ने सोमवार को कहा कि अदालतें नतीजों से नहीं, बल्कि प्रक्रिया की निष्पक्षता से वैधता हासिल करती है. उन्होंने इस बात पर जोर दिया कि जो लोग हारते हैं, उन्हें भी यह मानकर चलना चाहिए कि सिस्टम ने उनके साथ सही बर्ताव किया है.
उन्होंने इस बात पर जोर दिया कि जनता का ‘भरोसा’ ही न्यायपालिका की असली ताकत (करेंसी) है और न्याय न सिर्फ होना चाहिए बल्कि होता हुआ दिखना भी चाहिए. सीजेआई यहां राष्ट्रीय राजधानी में राम जेठमलानी मेमोरियल लेक्चर सीरीज में बोल रहे थे. इवेंट का थीम था ‘जस्टिस सीन टू बी डन, ट्रांसपेरेंसी एंड पब्लिक ट्रस्ट एज पिलर्स ऑफ द लीगल सिस्टम’.
सीजेआई ने कहा, ‘जीतने से कोर्ट को उसकी लेजिटिमेसी नहीं मिलती, बल्कि प्रोसेस की फेयरनेस से मिलती है. केस हारने से अपने आप में कोर्ट का जनता का भरोसा कम नहीं होता, जबकि गलत काम करते हुए देखा जाना, निश्चित रूप से होता है.’
उन्होंने कहा कि कोर्ट का भरोसा तब नहीं मिलता जब उसे पसंद किया जाता है, या लोगों के चाहे हुए नतीजे दिए जाते हैं. सीजेआई ने कहा कि जनता का भरोसा बदले में जनता की मंजूरी जैसा नहीं होता, और यह फर्क बहुत मायने रखता है. उन्होंने इस बात पर जोर दिया कि कोर्ट तब भरोसा पाता है जब हारने वाले लोग जो बिल्कुल अलग नतीजा चाहते थे, फिर भी यह मानते हुए चले जाते हैं कि जिस प्रोसेस ने उनके खिलाफ फैसला सुनाया वह सही था. उन्होंने आगे कहा कि यह मंजूरी पाने से कहीं ज़्यादा मुश्किल काम है, और कहीं ज़्यादा कीमती भी.
राष्ट्रीय शैक्षिक अनुसंधान और प्रशिक्षण परिषद (एनसीईआरटी) की एक टेक्स्टबुक से जुड़ी खुद से की गई कार्रवाई का जिक्र करते हुए उन्होंने कहा, ‘अपने ऑर्डर में हमने दोहराया कि ज्यूडिशियरी, एक इंस्टीट्यूशन के तौर पर आलोचना के खिलाफ नहीं है, और न ही हो सकती है, क्योंकि ज्यूडिशियल कामकाज की सही, जानकारी वाली और कंस्ट्रक्टिव आलोचना एक मजबूत कॉन्स्टिट्यूशनल डेमोक्रेसी की एक जायज और जरूरी खासियत है, जो संस्थागत जवाबदेही और खुद को सुधारने में मदद करती है.’
उन्होंने आगे कहा, ‘यह ट्रांसपेरेंसी के दिल में है, क्योंकि कोई कोर्ट खुद को जांच से परे रखकर जनता का भरोसा नहीं जीत सकता. उसे जांच, सवाल और जहां जरूरी हो, आलोचना के लिए तैयार रहना चाहिए.’ उन्होंने कहा कि कोर्ट अक्सर असल में दूर महसूस होती है और प्रोसेस अक्सर इस तरह से मुश्किल होते हैं कि वे उन लोगों के पक्ष में होते हैं जो उन्हें समझने वाले वकीलों का खर्च उठा सकते हैं.
उन्होंने कहा, ‘इस तरह के मंच से यह मानना सबसे आरामदायक बात नहीं है लेकिन यह सच है और इसे ईमानदारी से मानना ही इस बारे में बात करने की एकमात्र असली शुरुआत है कि अब क्या बदल रहा है.’ सीजेआई ने कहा कि न्याय न केवल किया जाना चाहिए, बल्कि ऐसा दिखना भी चाहिए कि न्याय हो रहा है और कोर्ट के लिए ट्रांसपेरेंसी केवल खुले दरवाजे और पब्लिक हियरिंग का मामला नहीं है, हालांकि इसमें निश्चित रूप से वे चीजें शामिल हैं.
उन्होंने कहा कि इसका मतलब है कि किसी फैसले के पीछे की वजह न कि सिर्फ उसका नतीजा, कोई भी देख सकता है जो देखना चाहे, जिसमें वे लोग भी शामिल हैं जिनके खिलाफ फ़ैसला गया है. उन्होंने कहा कि कोई भी कोर्ट, आखिरकार, किसी आदेश पर वसूली के लिए सेना नहीं भेज सकता और उसका अधिकार तभी तक रहता है जब तक लोग बिना किसी दबाव के यह मानते रहें कि इसका पालन सच में होना चाहिए.
सीजेआई ने कहा, ‘अगर यह सच है, और मैं पूरे दिल से मानता हूँ कि यह सच है, तो जनता का भरोसा कोई सजावट नहीं है. असल में यह एकमात्र करेंसी है जिसमें अधिकार दिया जाता है. एकमात्र सिक्का है जिसे ज्यूडिशियरी ने सच में कभी रखा है.’
उन्होंने कहा कि भरोसा ऐसी चीज नहीं है जिसे कोई संस्था एक बार कमाकर हमेशा के लिए उस पर निर्भर कर सके. इसे लगातार रिन्यू करना पड़ता है, और यह किसी एक पल या फैसले से कहीं ज़्यादा, लोगों के सिस्टम के केस दर केस जमा हुए, आम अनुभव से बनता है.
उन्होंने कहा, और कहा कि इसे कमाने का काम, इस मायने में कभी खत्म नहीं होता. सीजेआई ने कहा कि इसीलिए ट्रांसपेरेंसी का छोटा, बिना दिखावटी काम भी उतना ही मायने रखता है जितना कोई एक लैंडमार्क फैसला. उन्होंने कहा कि यह कोई एक सुधार नहीं है जो जनता के भरोसे को बचाता है, बल्कि यह कई ईमानदार, आम सुधारों का जमा हुआ वजन है, जो समय के साथ बना रहता है.
उन्होंने कहा कि ट्रांसपेरेंसी मायने रखती है क्योंकि इसी से सबसे पहले भरोसा कमाया जा सकता है. सीनियर एडवोकेट महेश जेठमलानी ने भी इवेंट में बात की और ज्यूडिशियरी और ट्रिब्यूनल में करप्शन के लिए ‘फिक्सर वकीलों’ की भूमिका पर चिंता जताई, उन्होंने कहा कि उनकी पहचान लीगल बिरादरी में जानी जाती है और इसे सुप्रीम कोर्ट कॉलेजियम के साथ शेयर किया जाना चाहिए.
उन्होंने कहा, ‘जुडिशियरी या ट्रिब्यूनल में बिना फिक्सर-वकीलों के करप्शन नहीं हो सकता जो रिश्वत देकर पूरे लीगल सिस्टम को धोखा देते हैं. बार में हर कोई जानता है कि वे कौन हैं. उनके नाम शायद इंटेलिजेंस एजेंसियों के पास है और अगर पहले से नहीं बताए गए हैं तो सुप्रीम कोर्ट कॉलेजियम को बता दिए जाने चाहिए.’
